International Research journal of Management Sociology & Humanities
( ISSN 2277 - 9809 (online) ISSN 2348 - 9359 (Print) ) New DOI : 10.32804/IRJMSH
**Need Help in Content editing, Data Analysis.
Adv For Editing Content
पञ्चस्तिकाय में निहित आत्म-तत्त्व विमर्श
1 Author(s): KHUSHBU KUMARI JAIN
Vol - 5, Issue- 5 , Page(s) : 99 - 104 (2014 ) DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
जैनाचार्य कुन्दकुन्द स्वामी का समय प्रथम शती है जिन्होंने सर्वप्रथम आध्यात्मिक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनके पूर्ववर्ति जैनाचार्यों ने सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना में ही अधिक रुचि दिखाई। इस प्रकार जैन दर्शन का एक दार्शनिक शाखा के रूप में स्थापित करने में कुन्दकुन्द स्वामी की मौलिक एवं अभूतपूर्व भूमिका है। कुन्दकुन्द ने इस हेतु विपुल साहित्य की सर्जना की जिसमें दर्शन से सम्बन्धित ग्रन्थों में ‘प्रवचनसार’, ‘समयसार’ एवं ‘पञ्चास्तिकाय’ का महत्वपूर्ण स्थान है।