( ISSN 2277 - 9809 (online) ISSN 2348 - 9359 (Print) ) New DOI : 10.32804/IRJMSH

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जायसी कृत ‘अखरावट’ में परमात्मा संबंधी विचार

    1 Author(s):  RAKSHA

Vol -  11, Issue- 5 ,         Page(s) : 154 - 160  (2020 ) DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH

Abstract

हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल अर्थात् पूर्व मध्यकाल को स्वर्ण युग माना गया है। इस काल में दो काव्यधाराएँ प्रवाहित रही हैं। एक निर्गुण काव्यधारा दूसरी सगुण काव्यधारा। इन काव्यधाराओं के रचनाकार हिन्दी साहित्य जगत की अमूल्य निधि हैं। इन्हीं रचनाकारों में एक नाम ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ का आता है। सूफी कवि ‘जायसी’ भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा के अन्तर्गत आने वाली प्रेममार्गी शाखा के ऐसे कवि हैं जिनका नाम हिन्दी साहित्य जगत में बड़े आदर एवं सम्मान के साथ आज भी स्मरण किया जाता है। हिन्दी साहित्य में उनका योगदान बड़ा ही महत्त्वपूर्ण रहा है। अपनी लेखनी के बल पर वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं।

1. जायसी ग्रंथावली, (सं) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रकाशन संस्थान, संस्करणः 2013
2. कन्हावत, डॉ. शिव सहाय पाठक, साहित्य भवन (प्रा.) लिमिटेड, प्रथम संस्करणः 1981
3. कहरानामा और मसलानामा, श्री अमरबहादुर सिंह ‘अमरेश’ हिन्दुस्तानी एकेडेमी, प्रथम संस्करणः 1962
4. जयसी साहित्यसृष्टि एवं लोकदृष्टि, डॉ. अम्बिकेश त्रिपाठी, दुर्गा पब्लिकेशन्स, प्रथम संस्करणः 2014         

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