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उत्तराखण्ड की मंदिर-वास्तुकला कुमाऊँ के मंदिरों के विशेष संदर्भ में
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Author(s):
PRASHANT JOSHI
Vol - 7, Issue- 4 ,
Page(s) : 104 - 110
(2016 )
DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
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Abstract
मनोगत भावों को सौन्दर्य के साथ दृश्य रूप में व्यक्त करना ही कला है। कला मनुष्य की सौन्दर्य भावना को मूत्र्तरूप प्रदान करती है। प्रत्येक कलात्मक प्रक्रिया का उद्देश्य सौन्दर्य तथा आनन्द की अभिव्यक्ति होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा इस रूप में उसे अपनी भावनाओं तथा विचारों का प्रत्यक्षीकरण अथवा प्रकटीकरण करना पड़ता है, जो कला के माध्यम से ही संभव है। प्राचीन काल में कला को साहित्य और संगीत के समकक्ष मानते हुए मनुष्य के लिए उसे आवश्यक बताया गया है। ‘नीतिशतक’ मंे भर्तृहरि कहते है कि ‘साहित्य संगीत तथा कला से हीन मनुष्य पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु के समान है’-
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