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 माॅरीषसः भारतीय कुली प्रथा का आरम्भ एवं उन्मूलन


    Author(s):  AMIT KUMAR SAINI  
Abstract

शोध-सार- माॅरीषस को जब ब्रिटिषों ने अपना उपनिवेष बनाया उस समय वहाॅं पर दास प्रथा का चलन था परन्तु दास प्रथा की समाप्ति के बाद ब्रिटिष बागान मालिकों के समक्ष श्रम की समस्या उत्पन्न हो गई थी। गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन के लिये अधिक से अधिक श्रम की आवष्यकता थी अतः ब्रिटिषों ने पहली बार एक नया प्रयोग किया जिसके अन्तर्गत एक अनुबन्ध के द्वारा श्रमिकों का प्रवास कराया गया और यह प्रयोग सबसे पहली बार मांॅरीषस मे किया था। भारतीय गरीब अनपढ़ जनता को बहला-फुसलाकर भेज दिया जाता था। कालोनी मे जाकर भारतीय श्रमिकों को अनेक प्रकार की समस्याओं से गुजरना पड़ता था। कुछ वर्षों के उपरान्त भारतीयों को ज्ञात हुआ कि प्रवासी भारतीय श्रमिकों के साथ अमानवीय दुव्र्यवहार किया जा रहा है। इस श्रमिक प्रणाली मे बहुत अधिक बुराइयाॅं व्याप्त थी। अतः भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इस प्रणाली पर जोरदार प्रहार करना आरम्भ किया और ब्रिटिष अधिकारियों एवं सरकार पर इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का दबाव बनाया। भारत ब्रिटेन का उपनिवेष था जिस कारण भारतीय राष्ट्रवादी नेता उनके सहयोग के बिना कुछ भी नही कर सकते थे। भारतीयों के एक स्वर मे आवाज उठाने का असर यह हुआ कि ब्रिटिष सरकार झुक गई और अन्ततः उसे माॅरीषस मे इस अमानवीय प्रथा का 1910 ई0 मे उन्मूलन करने की घोषणा करनी पड़ी। शोध-पत्र- वर्तमान का माॅरीषस देष जो कि दक्षिण-पष्चिमी हिन्द महासागर मे स्थित है एक छोटा सा देष है, इस टापू को सबसे पहले डचों ने अपनी कालोनी के रुप मे विकसित करने का प्रयास किया था और सर्वप्रथम यहाॅं पर गन्ने की खेती कराना आरम्भ किया था परन्तु वह पूर्णरुप से सफल नही हो पाये थे, डचों के उपरान्त माॅरीषस फ्रांसीसियों का उपनिवेष बना जिन्होने लगभग 90 वर्षों तक शासन किया और इसे पूर्ण विकसित कालोनी बनाने का प्रयास किया। औपनिवेषिक सत्ता विस्तार के अन्र्तगत ब्रिटिषों ने 1810 ई0 मे माॅरीषस को अपनी औपनिवेषिक कालोनी बनाने मे सफलता पाई। ब्रिटिषों ने माॅरीषस को एक गन्ना कालोनी के रुप मे विकसित किया और भारतीय गरीब जनता को कुलियों के रुप मे यहाॅं पर प्रवास कराया। ब्रिटिषों ने 1833 ई0 मे ब्रिटेन एवं अपनी औपनिवेषिक कालोनियों से दास प्रथा का उन्मूलन कर दिया परन्तु माॅरीषस मे दास व्यवस्था की जटिलताओं के कारण 1835 ई0 मे दास प्रथा अधिनियम लागू हो पाया था। दास प्रथा के उन्मूलन के समय, दास-मालिकों को उनके दासों के बदले मे 2,112,632 पौंड का मुआवजा मिला । दास प्रथा की समाप्ति के बाद बागान मालिकों के समक्ष श्रम का संकट उत्पन्न हो गया था और इस संकट से बचने के लिये मुक्त हुये दासों को अपने पुराने मालिकों के लिये कुछ वर्षों तक अभी और कार्य कराया गया था।


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